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कर्नाटक के विधायक नहीं चाहते महिलाओं की नाइट शिफ्ट
amarujala.com- Presented by: पवन नाहर
Updated Thu, 30 Mar 2017 10:48 AM IST
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नाइट शिफ्ट में महिला
- फोटो : Getty Images
कर्नाटक में विधायकों एक समिति ने अनुसार महिलाओं को नाइट शिफ्ट नहीं करना चाहिए और इसके इसके लिए कंपनियों को भी एहतियात बरतनी चाहिए। इस प्रस्ताव का कई महिलाओं और एक्टिविस्ट्स ने कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि यदि ऐसा होता है, तो कंपनियों में महिलाओं के लिए जगह कम हो जाएगी। यही तर्क देते हुए, कई महिलाओं ने 26 सप्ताह के मातृत्व अवकाश पर भी ऐतराज जताया है।
इस प्रस्ताव को पेश करने वाले समिति के प्रमुख एन.ए हैरिस ने कहा कि महिलाओं पर कई जिम्मेदारियां होती हैं। उन्हें घर परिवार का ख्याल रखना होता है। एक चैनल से बात करते उन्होंने कहा, "एक औरत पर कई जिम्मेदारियां होती हैं। उन्हें बच्चों का ख्याल रखना होता है। अगर वो रात को काम करेंगी, तो वो अपने बच्चों को नजरअंदाज करेंगी।" उन्होंने कहा कि एक पति अपनी पत्नी की सहायता कर सकता है, मगर मां नहीं बन सकता।
हैरिस ने कहा, "इसके अलावा नाइट शिफ्ट में महिलाओं की सुरक्षा भी एक बड़ा सवाला है। समाज में पुरुषों की जिम्मेदारी ज्यादा होती है। एक परिवार में महिलाओं की जिम्मेदारी अधिक होती है और हमें यह समझना होगा।"
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इस प्रस्ताव को पेश करने वाले समिति के प्रमुख एन.ए हैरिस ने कहा कि महिलाओं पर कई जिम्मेदारियां होती हैं। उन्हें घर परिवार का ख्याल रखना होता है। एक चैनल से बात करते उन्होंने कहा, "एक औरत पर कई जिम्मेदारियां होती हैं। उन्हें बच्चों का ख्याल रखना होता है। अगर वो रात को काम करेंगी, तो वो अपने बच्चों को नजरअंदाज करेंगी।" उन्होंने कहा कि एक पति अपनी पत्नी की सहायता कर सकता है, मगर मां नहीं बन सकता।
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हैरिस ने कहा, "इसके अलावा नाइट शिफ्ट में महिलाओं की सुरक्षा भी एक बड़ा सवाला है। समाज में पुरुषों की जिम्मेदारी ज्यादा होती है। एक परिवार में महिलाओं की जिम्मेदारी अधिक होती है और हमें यह समझना होगा।"
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'महिलाओं की आजादी स्वीकार करें मर्द'
कामकाजी महिला
- फोटो : Fox News
इस समिति के प्रस्ताव से कंपनियां और कर्मचारी दोनों ही परेशान हैं। उनका तर्क है कि कल को वो महिलाओं को घर पर रहने और बच्चे पालने के लिए कहेंगे। उन्हें इससे क्या मतलब। यह पितृात्मक सोच को दर्शाता है, जो इस सदी के लिए धब्बा है। सुरक्षा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है और इसी लिए लोग टैक्स भरते हैं। सरकार यह तय नहीं करेगी की लोग क्या करेंगे।
गौरतलब है कि बंगलूरू में 15 लाख आईटी कर्मचारी हैं। इसमें से एक-तिहाई कर्मचारी महिलाए हैं। इस तरह के प्रस्ताव से महिलाओँ की नौकरियां खतरे में पड़ जाएंगी। महिलाओं का कहना है कि उन्हें बड़ी मुश्किलों को बाद समाज की बंदिशें तोड़कर काम करने की इजाजत मिली है। इस तरह के प्रस्ताव उनकी आजादी और अधिकारों पर कैंची चलाने जैसा है।
शहर की कामकाजी महिला ने कहा कि उन्हें मालूम है कि उनकी जिम्मेदारियां क्या हैं। उन्हें नहीं लगता कि उनसे ज्यादा बेहतर कोई यह बात समझता होगा। उन्होंने कहा कि पुरुषों में महिलाओं का आजादी और प्रगति स्वीकार करने का साहस होनो जरूरी है।
गौरतलब है कि बंगलूरू में 15 लाख आईटी कर्मचारी हैं। इसमें से एक-तिहाई कर्मचारी महिलाए हैं। इस तरह के प्रस्ताव से महिलाओँ की नौकरियां खतरे में पड़ जाएंगी। महिलाओं का कहना है कि उन्हें बड़ी मुश्किलों को बाद समाज की बंदिशें तोड़कर काम करने की इजाजत मिली है। इस तरह के प्रस्ताव उनकी आजादी और अधिकारों पर कैंची चलाने जैसा है।
शहर की कामकाजी महिला ने कहा कि उन्हें मालूम है कि उनकी जिम्मेदारियां क्या हैं। उन्हें नहीं लगता कि उनसे ज्यादा बेहतर कोई यह बात समझता होगा। उन्होंने कहा कि पुरुषों में महिलाओं का आजादी और प्रगति स्वीकार करने का साहस होनो जरूरी है।