दुनियाभर में तेजी से क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। लिहाजा हृदय रोग, डायबिटीज और कैंसर के मामले जो कुछ दशकों पहले तक उम्र बढ़ने के साथ होते थे, वह अब न सिर्फ बच्चों तक को अपना शिकार बना रहे हैं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव भी बढ़ाते जा रहे हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि इसमें कई पर्यावरणीय कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है, बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक का प्रदूषण उनमें से एक है जिसको लेकर विशेषज्ञ काफी चिंतित हैं।
Alert: फेफड़ों के कैंसर से लेकर बच्चों के दिमाग पर भी देखा जा रहा है बुरा असर, सामने आई इसकी बड़ी वजह
माइक्रोप्लास्टिक आज 'अंटार्कटिका की बर्फ से लेकर महासागरों की गहराइयों, पहाड़ों, मिट्टी, हवा, पानी और यहां तक कि मानव रक्त, मस्तिष्क और फेफड़ों तक में अपनी पैठ बना चुका है। यह अध्ययन उस खतरनाक मोड़ को दर्शाता है जहां केवल पर्यावरण ही नहीं, मानव शरीर भी प्लास्टिक प्रदूषण का शिकार बन चुका है।
हर तरफ बढ़ता माइक्रोप्लास्टिक का खतरा
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि माइक्रोप्लास्टिक आज 'अंटार्कटिका की बर्फ से लेकर महासागरों की गहराइयों, पहाड़ों, मिट्टी, हवा, पानी और यहां तक कि मानव रक्त, मस्तिष्क और फेफड़ों तक में अपनी पैठ बना चुका है। यह अध्ययन उस खतरनाक मोड़ को दर्शाता है जहां केवल पर्यावरण ही नहीं, मानव शरीर भी प्लास्टिक प्रदूषण का शिकार बन चुका है।
हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जो प्लास्टिक रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी से इस्तेमाल हो रहा है, वही अब हमारे शरीर में सांसों के साथ घुसकर फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को कैंसर जैसी बीमारियों की ओर धकेल रहा है।
फेफड़ों की कोशिकाओं पर माइक्रोप्लास्टिक का असर
जर्नल हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित यह अध्ययन पहली बार वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट करता है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि एक जैविक खतरा बन चुका है। दही के कप से लेकर खाने की पैकेजिंग तक जो प्लास्टिक हमारी रोजमर्रा की सुविधाओं का हिस्सा बन चुका है वही अब वैज्ञानिकों की नजर में एक गंभीर जैविक खतरा बनकर उभरा है।
ऑस्ट्रिया स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ विएना के वैज्ञानिकों ने चेताया है कि हवा में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद नैनोप्लास्टिक के महीन कण हमारे फेफड़ों की कोशिकाओं में कैंसर और जैसे बदलाव पैदा कर सकते हैं।
पॉलीस्टायरीन से बने सूक्ष्म प्लास्टिक कण जिनका इस्तेमाल आमतौर पर खाद्य पैकेजिंग में होता है, फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को डीएनए क्षति, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और कोशिका वृद्धि से जुड़े जोखिमों को बढ़ाने वाला हो सकता है।
शिशु की सेहत पर भी बढ़ता खतरा
माइक्रोप्लास्टिक सिर्फ फेफड़ों के लिए खतरा नहीं बढ़ा रहा, इससे बच्चों की सेहत पर भी गंभीर असर हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल शिशु की सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। इससे न सिर्फ शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है, बल्कि इससे क्रॉनिक बीमारियों का भी खतरा हो सकता है।
स्वीडन स्थित कार्लस्टेड यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ साइंसेज के प्रोफेसर कार्ल गुस्ताफ बोर्नहैग कहते हैं, प्लास्टिक की चीजों को बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन बिस्फेनॉल एफ के कारण शरीर में कई प्रकार के ऐसे परिवर्तन आ सकते हैं जिससे बच्चों की दिमागी क्षमता प्रभावित हो सकती है।
माइक्रोप्लास्टिक के कारण होने वाली इन समस्याओं को भी जानिए
- इससे पहले यूनिवर्सिटी ऑफ वियाना के ही साल 2022 में प्रकाशित के शोध में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक आंतों की परत को कमजोर कर सकता है और पाचन से जुड़ी बीमारियां बढ़ा सकता है।
- इसके अलावा एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक अन्य शोध में विशेषज्ञों ने बताया था कि गर्भावस्था के दौरान माइक्रोप्लास्टिक का संपर्क भ्रूण तक पहुंच सकता है, जिससे गर्भावस्था से संबंधित समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है।
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स्रोत
Microplastics in the Air May Be Leading to Lung and Colon Cancers
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