सु्प्रीम कोर्ट अपडेट: वकीलों से कथित मारपीट मामले में अदालत सख्त, दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जांच के निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की जांच के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की अगुवाई में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जांच पूरी होने के बाद संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के सामने रिपोर्ट पेश की जाए।
यह आदेश दिल्ली हाईकोर्ट के 21 सितंबर के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। हाईकोर्ट ने वकीलों की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें कथित मारपीट की जांच सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग की गई थी।
बीसीआई कार्यालय के अंदर और बाहर मारपीट का आरोप
याचिकाकर्ता वकीलों ने आरोप लगाया था कि 20 और 21 अगस्त की दरमियानी रात बीसीआई कार्यालय के अंदर और बाहर उनके साथ तथा अन्य वकीलों के साथ मारपीट की गई थी। सोमवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले में कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
उन्होंने कहा कि वकीलों ने 22 अगस्त को दिल्ली के आईपी एस्टेट थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को शिकायत दी थी, लेकिन अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने निजी शिकायत दर्ज कराना बेहतर विकल्प नहीं होगा।
भूषण ने दलील दी कि किसी व्यक्ति के साथ मारपीट करना निश्चित रूप से संज्ञेय अपराध है। उन्होंने यह भी कहा कि बीसीआई को कथित मारपीट में शामिल वकीलों के खिलाफ पेशेवर कदाचार की कार्रवाई करनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में प्रतिवादियों को अभी नोटिस जारी नहीं किया गया है। हालांकि, घटना की उचित जांच सुनिश्चित करने और उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश जारी किए।
पीठ ने कहा कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर 22 अगस्त को दी गई शिकायत की जांच सुनिश्चित करें और इसके लिए एसआईटी गठित की जाए। जांच दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच की मांग पर जताई थी असहमति
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस दलील पर असहमति जताई थी कि मानन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ दल से जुड़े सांसद हैं, इसलिए दिल्ली पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करेगी और सीबीआई से जांच कराना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा था कि इस आशंका के समर्थन में कोई ठोस आधार पेश नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, बिना किसी विशिष्ट आधार के पूरे दिल्ली पुलिस बल की निष्पक्षता पर सवाल उठाना उचित नहीं है, खासकर तब जब याचिकाकर्ताओं के मामले में संज्ञेय अपराध बनना साबित नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सीबीआई भी एक सरकारी एजेंसी है। किसी सरकारी संस्था के खिलाफ सामान्य और आधारहीन आरोप लगाने से आम लोगों के मन में पूरी व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है। हाईकोर्ट ने वकीलों को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 के तहत शिकायत दर्ज कराने का वैकल्पिक उपाय भी बताया था।
बीसीआई के कामकाज पर सवाल उठाते हुए हुआ था प्रदर्शन
20 अगस्त को वकीलों के एक समूह ने दिल्ली में बीसीआई कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने संगठन के कामकाज में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए अध्यक्ष मानन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग की थी। प्रदर्शन के दौरान वकीलों ने एडवोकेट्स प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने, सभी वकीलों के लिए बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने और कानून कॉलेजों का नियमित व पारदर्शी निरीक्षण सुनिश्चित करने जैसी मांगें भी उठाई थीं।
इस प्रदर्शन का आह्वान ऑल इंडिया यंग एडवोकेट्स एसोसिएशन ने किया था और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने इसका समर्थन किया था।
एनएएलएसएआर के छात्रों से जुड़ा विवाद भी रहा चर्चा में
मानन कुमार मिश्रा इससे पहले एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों से जुड़े एक आदेश को लेकर भी विवाद में आए थे। उन्होंने विश्वविद्यालय के मौजूदा बैच के किसी भी स्नातक को वकील के रूप में नामांकित नहीं करने के लिए राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था। आलोचना के बाद यह आदेश वापस ले लिया गया था।
विवाद तब शुरू हुआ जब एनएएलएसएआर के कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय के कुलपति, रजिस्ट्रार और प्रोफेसरों को पत्र लिखकर दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया था। पहले परिपत्र में मिश्रा ने कहा था कि मुख्य न्यायाधीश के दीक्षांत समारोह में शामिल होने के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से जुड़ी शिकायतों की जांच की जा रही है और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने के लिए रिपोर्ट मांगी गई है।
कानूनी समुदाय के सदस्यों की आलोचना के बाद कुछ ही घंटों में फैसला बदल दिया गया। संशोधित आदेश में कहा गया कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कुछ लोगों के कथित आचरण के लिए पूरे बैच को दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने वकीलों से मंगलवार को सफेद रिबन पहनने की अपील की है। यह कदम राष्ट्रीय राजधानी में हाल के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा साथी वकीलों के साथ कथित दुर्व्यवहार और मारपीट के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए उठाया गया है। एससीबीए की मानद सचिव प्रज्ञा बघेल के हस्ताक्षर वाले एक परिपत्र में कहा गया है कि एसोसिएशन की कार्यकारी समिति के अधिकांश सदस्यों ने 10 अक्टूबर को पारित प्रस्ताव के मद्देनजर यह फैसला लिया है।
एसोसिएशन ने अपने सदस्यों से मंगलवार दोपहर 1:15 बजे महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने एकत्र होने का भी अनुरोध किया है। वहां बार के सदस्यों के प्रति एकजुटता व्यक्त करने के लिए एक मिनट का मौन रखा जाएगा। परिपत्र में वकीलों और बार के सदस्यों से अपने कोट पर सफेद रिबन लगाने की अपील की गई है। इसका उद्देश्य उन वकीलों के प्रति समर्थन जताना है, जिनके साथ पुलिस द्वारा कथित तौर पर दुर्व्यवहार और मारपीट की गई। दिल्ली में ये विरोध प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किए जा रहे हैं।
एससीबीए ने शनिवार को उन खबरों की निंदा की थी, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सीजेपी की ओर से आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए जंतर-मंतर जा रहे वकीलों पर पुलिस द्वारा "अत्यधिक बल" प्रयोग किए जाने की बात कही गई थी। एसोसिएशन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की भी अपील की थी। एससीबीए की यह अपील ऐसे समय आई है, जब विरोध प्रदर्शनों के वकीलों पर पड़ने वाले असर और राजधानी में न्यायिक संस्थानों के सुचारू कामकाज को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका का विरोध, प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की मांग
दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान यातायात और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर अधिकारियों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दाखिल किया गया है। इसमें कहा गया है कि एकत्र होने का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और यात्रियों की आवाजाही के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता।
यह आवेदन सुप्रीम कोर्ट में चल रही अवमानना कार्यवाही के बीच दाखिल किया गया है। शीर्ष अदालत की रविवार को विशेष रूप से गठित पीठ ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाने संबंधी निर्देशों का कथित रूप से पालन नहीं करने के मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे।
याचिका में की गई क्या मांग?
दिल्ली निवासी सतीश कुमार अग्रवाल ने अधिवक्ता अनंथा नारायण एमजी के माध्यम से यह हस्तक्षेप आवेदन दाखिल किया है। आवेदक ने कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है, लेकिन इसके साथ संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत नागरिकों को स्वतंत्र रूप से आवागमन करने के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है।
आवेदन में कहा गया है कि 6 अक्तूबर से जारी प्रदर्शनों के कारण लुटियंस दिल्ली की प्रमुख सड़कों, जिनमें जनपथ और संसद मार्ग शामिल हैं, पर यातायात प्रभावित हुआ है। इससे दफ्तर जाने वाले लोगों, विद्यार्थियों और मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
आवेदन में किन चीजों का किया गया जिक्र?
आवेदन में व्यापारिक संगठनों की ओर से की गई अपीलों का भी जिक्र किया गया है। इनमें चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) भी शामिल है, जिसने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर दिवाली जैसे त्योहारों से पहले कारोबार में अनुमानित 70 प्रतिशत गिरावट की बात कही है। संगठन ने सरकार से मुख्य व्यावसायिक क्षेत्रों से बाहर प्रदर्शन के लिए स्थायी स्थान निर्धारित करने का आग्रह किया है।
आवेदन में कहा गया है, "वर्तमान कार्यवाही में उचित राहत तय करते समय उन नागरिकों के हितों पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए, जो प्रदर्शनों में शामिल नहीं हैं। इनमें वरिष्ठ नागरिक, मरीज, दिव्यांगजन, गर्भवती महिलाएं, विद्यार्थी, कर्मचारी और सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर लोग शामिल हैं।"
आवेदक ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के मजदूर किसान शक्ति संगठन मामले और 2012 के रामलीला मैदान मामले के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया है। आवेदन में कहा गया है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार उचित प्रतिबंधों के अधीन है और अव्यवस्था रोकने के लिए पुलिस के पास कानून के तहत आवश्यक निर्णय लेने का अधिकार बना रहना चाहिए। मुख्य अवमानना याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दाखिल की है। इसमें केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) की अध्यक्ष डी. थारा पर सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है।
रविवार को हुई विशेष सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए, इंटरनेट सेवाएं निर्बाध रूप से उपलब्ध रहें और दिल्ली मेट्रो का संचालन सामान्य रूप से जारी रहे। अदालत ने न्याय तक नागरिकों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अपने परिसर के बाहर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू होने की सूचना देने वाले बोर्ड को तत्काल हटाने का भी आदेश दिया।