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भारत-अमेरिका संबंध: ऊर्जा के रास्ते सुधरेंगे रिश्ते? ट्रंप प्रशासन को नजर आया रिफाइनिंग सुपरपावर का महत्व
सार
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की यात्रा ने साबित किया है कि भारत-अमेरिका संबंधों में टैरिफ विवादों से ऊपर उठकर व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा बड़ा आधार बन गई है। अमेरिका ने भारत की रिफाइनिंग क्षमता और जामनगर के महत्व को स्वीकार किया है, जो वेनेजुएला के कच्चे तेल के शोधन में बड़ा बफर साबित हो सकता है। ट्रंप प्रशासन को भारत की रिफाइनिंग सुपरपावर का महत्व नजर आया है।
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एस जयशंकर, मार्को रूबियो (फाइल)
- फोटो : एएनआई (फाइल)
विस्तार
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो की यात्रा के दौरान मुंबई से जामनगर तक उनके फोकस ने साबित किया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध हमेशा तात्कालिक जरूरतों के आधार पर तय होते हैं। टैरिफ की रस्साकशी के बीच आखिरकार व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा ही सबसे बड़ा आधार बनती है। ट्रंप प्रशासन का यह रुख इस बात का गवाह है कि अमेरिका भारत को वैश्विक ऊर्जा संकट से पार पाने वाले एक जरूरी स्तंभ- यानी रिफाइनिंग सुपरपावर- के तौर पर देख रहा है।
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ऊर्जा कूटनीति का दांव
पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच रूस से तेल आयात और कड़े टैरिफ कानूनों को लेकर असहजता दिखाई दे रही थी। अमेरिका चाहता था कि भारत रूस से ऊर्जा आयात में कटौती करे, लेकिन भारत ने लगातार अपनी ऊर्जा संप्रभुता और 140 करोड़ नागरिकों की जरूरतों को सर्वोपरि रखकर स्पष्ट रेड लाइन खींच दी थी। लिहाजा कूटनीतिक गतिरोध पाटने के लिए अमेरिका ने व्यावहारिक रास्ता निकाला। रुबियो का यह स्वीकार करना कि भारत एक रिफाइनिंग सुपरपावर है और वेनेजुएला के कच्चे तेल के शोधन में रिलायंस जैसी कंपनियां अहम भूमिका निभा सकती हैं, इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका अब भारत से तालमेल बिठाने को प्राथमिकता दे रहा है।
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वेनेजुएला का नया समीकरण
रुबियो ने मुंबई से सीधे गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस की रिफाइनरी का रुख किया। अमेरिका जानता है कि दुनिया के इस सबसे बड़े रिफाइनिंग हब के पास कच्चे तेल को परिष्कृत करने की बेजोड़ तकनीकी क्षमता और अनुभव है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और कार्यकारी निदेशक अनंत अंबानी ने अमेरिकी विदेश मंत्री और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर को इस विशाल परिसर का दीदार कराया। वेनेजुएला का तेल भले ही रातों-रात वैश्विक आपूर्ति में आई कमी न भर पाए, लेकिन यह अमेरिका और उसके साझीदारों के लिए एक बड़ा बफर साबित हो सकता है। यात्रा के दौरान अमेरिकी प्रतिबंधों जैसी बाधाओं को पार करने पर होने वाली चर्चा दिखाती है कि ट्रंप प्रशासन व्यावहारिक समाधान तलाशने पर गंभीर हैं।
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पारंपरिक ऊर्जा से आगे
इस दौरे का दायरा केवल तेल तक सीमित नहीं रहा। रिलायंस के बयान के मुताबिक चर्चा के दौरान कंपनी की न्यू एनर्जी गीगा फैक्ट्रियों और निर्माणाधीन डेटा सेंटर्स पर भी विशेष फोकस रहा। अमेरिकी नेतृत्व के सामने ऊर्जा और डिजिटल बुनियादी ढांचे के इस संगम को रखा गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि दोनों देश आने वाले समय में तकनीकी, उन्नत विनिर्माण और ग्रीन एनर्जी के मोर्चे पर साझेदारी की तैयारी कर रहे हैं।
व्यावहारिक कूटनीति की जीत
ऊर्जा और तकनीक के इन नए रास्तों ने लंबे समय से अटके भारत-अमेरिका व्यापारिक संवाद को भी नया जीवन दिया है। रुबियो ने संकेत दिए कि दोनों देश अब समझौतों के बेहद करीब हैं और कुछ अंतिम मामले सुलझाए जा रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का बदला हुआ रुख यह भी दिखाता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत को साथ रखने के लिए अमेरिका को भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक प्राथमिकताओं का सम्मान करना होगा। ऊर्जा और तकनीक के रास्ते शुरू हुई रिश्तों की यह मरम्मत द्विपक्षीय संबंधों को एक नए मुकाम पर ले जाने की क्षमता रखती है।
कठिन मोलभाव की बिसात